परीक्षा का कठिन दिन पर निबंध

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परीक्षा का ये कठिन दिन पर हिंदी निबंध - परीक्षा को लेकर मन में डर - गलत तरीकों का प्रयोग करना - समझ नहीं आता कौन-सा प्रश्न पूछे जायेंगे - परीक्षा के दिन क्या करना चाहिए - परीक्षा के दिन कैसे रहना चाहिए - Essay on Tough Day of Exam in Hindi - Tough Day of Exam Essay

रूपरेखा : प्रस्तावना - परीक्षा का भूत - अनुचित तरीकों का प्रयोग - प्रश्न पत्र को लेकर आशंकित - परीक्षा को लेकर भय - आत्मविश्वास की आवश्यकता - उपसंहार।

परिचय | परीक्षा का कठिन दिन की प्रस्तावना-

विद्यार्थी-जीवन में परीक्षाओं का सामना करना बिलकुल आम बात है। इसके बावजूद, किसी भी परीक्षा का कठिन दिन छात्रों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। परीक्षा के कठिन दिन का सामना करना बहुत डरावना होता है। हमलोग बहुत घबराए रहते हैं। हमने जो पढ़ा या याद किया उस हर चीज को बार-बार दोहराना चाहते हैं। हमलोग प्रश्न-पत्र के बारे में सोचते रहते हैं। उनका विश्वास रहता है कि यदि वे पहले दिन अच्छा करेंगे तो वे परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकते है। इसलिए परीक्षा का कठिन दिन भयानक लगता है। कुछ छात्र परीक्षाओं के कठिन दिन के पहले की रात सो नहीं पाते। बोर्ड-परीक्षा का मेरा परीक्षा का कठिन दिन भी ऐसा ही था।


परीक्षा का भूत | परीक्षा का डर-

परीक्षा के दिन परीक्षार्थी के लिए बड़े कठिन होते हैं । इन दिनों परीक्षार्थी अपनी समस्त शक्ति अध्ययन की ओर केन्द्रित कर एकाग्रचित होकर सम्भावित प्रश्नों को कंठस्थ करने के लिए लगा देता है। ये दिन उसके लिए परीक्षा देवो को प्रसन्न करने के लिए अनुष्ठान करने के दिन हैं, गृहकार्यों से मुक्ति, खेल-तमाशों से छुट्टी और मित्रों- साथियों से दूर रहने के दिन हैं।

परीक्षा परीक्षार्थी के लिए भूत है। भूत जिस पर सवार हो जाता है उसकी रातों की नींद हराम हो जाती है, दिन की भूख गायब हो जाती है और घर में सगे-सम्बन्धियों का आना बुरा लगता है। दूरदर्शन के मनोरंजक कार्यक्रम, मनपसन्द एपीसोड, चित्रहार आदि समय नष्ट करने के माध्यम लगते हैं।

परीक्षा के इन कठिन दिनों में परीक्षा-ज्वर (बुखार) चढ़ा होता है, जिसका तापमान परीक्षा-भवन में प्रवेश करने तक निरन्तर चढ़ता रहता है और प्रश्न-पत्र हल करके परीक्षा-भवन से बाहर आने पर ही सामान्य होता है। फिर अगले विषय की तैयारी का स्मरण होते है। ज्वरग्रस्त परीक्षार्थी निरन्तर विश्राम न कर पाने की पीड़ा से छटपटाता है। परीक्षाज्वर से ग्रस्त परीक्षार्थी क्रोधी बन जाता है, चिन्ता देकर उसके स्वास्थ्य को चौपट कर देती है।


अनुचित तरीकों का प्रयोग | गलत तरीकों का प्रयोग करना-

वर्ष के प्रारंभ से ही नियमपूर्वक अध्ययन न करने वाला परीक्षार्थी परीक्षा के इन कठिन दिनों में पवन-सुत हनुमान की भाँति एक ही उड़ान में परीक्षा-समुद्र लाँघना चाहता है। वह सहायक पुस्तकों का आश्रय ढूँढ़ता है, गलत-सलत जो भी पुस्तक मिल जाए, उसे देवता समझकर पूजता है, विष को भी अमृत समझकर पी जाता है।

'डूबते को तिनके का सहारा।' परीक्षा के कठिन दिनों में कतिपय छात्र नकल का आश्रय लेना चाहते हैं, किन्तु नकल के लिए भी अकल की जरूरत है। नकल के लिए निरीक्षक की आँखों में धूल झोंकने की चतुराई चाहिए। निरीक्षक को लोभ-लालच देकर या धमकी से सुविधा प्राप्त करने की शक्ति चाहिए। फिर नकल के लिए किन-किन प्रश्नों के संकेत लिखने हैं, किन-किन प्रश्नों का पूरा उत्तर को फाड़कर ले जाना है, यह निर्णय करने की योग्यता चाहिए। नकल की घबराहट में पढ़ा कुछ जाता है, लिखा कुछ जाता है। कंठस्थ उत्तर भी विस्मृत हो जाता है। कारण, आत्मविश्वास जो हिल जाता है।


प्रश्न पत्र को लेकर आशंकित | समझ नहीं आता कौन-सा प्रश्न पूछे जायेंगे-

परीक्षा के इन कठिन दिनों में परीक्षार्थी अहर्निश इस भय से ग्रस्त रहता है कि पता नहीं परीक्षा में क्‍या आएगा ? भय से वह अनेक कार्य करता है। वह अध्यापक की सहायता से सम्भावित प्रंश्नों को अलग कर लेता है, किन्तु वह जानता है परीक्षा मात्र संयोग है, प्रश्न-पत्र 'लाटरी' है। अनिश्चित और अविश्वसनीय है। परीक्षक प्रश्न-पत्र के माध्यम से उसके भाग्य के साथ क्रूर परिहास कर सकता है। भय का एक कारण प्रश्नों का प्रचलित परम्परागत शैली से हटना भी है। यदि परीक्षक 'समाचार-पत्र' पर निबंध न पूछकर ' जन-जागरण और समाचार-पत्र', मद्य-निषेध न पूछकर “मद्य-निषेध की अनिवार्यता,' 'परीक्षा' न पूछकर ' परीक्षा का कठिन दिन' पूछ बैठे, तो कुशल और योग्य परीक्षार्थी का मस्तिष्क भी चकरा जाता है, उसे मूर्च्छा आने लगती है और वह उदास हो जाता हैं।


परीक्षा को लेकर भय | परीक्षा को लेकर मन में डर-

परीक्षा का समय तीन घंटे निश्चित होता है । इस अल्पावधि का एक-एक क्षण अमूल्य होता है। प्रश्न-पत्र को अच्छी तरह समझकर हल करना और भी कठिन होता है। किसी प्रश्न या प्रश्नों का उत्तर लम्बा लिख दिया तो अन्य प्रश्न छूटने का भय रहता है। उत्तर प्रश्नों के अनुसार न दिए तो अंकों की न्यूनता की आशंका रहती है। विचारों की अभिव्यवित में सुन्दरता न आई तो पिछड़ने का भय रहता है । विचारों को व्यक्त करने के लिए भाषा अनुकूल न बनी, तो भी गड़बड़ होने की आशंका होती है। सबसे बड़ी कठिनाई तो तब आती है, जब रटा हुआ उत्तर लिखते-लिखते दिमाग में सारे उत्तर एक-दूसरे से मिल जाते है। अत: रटे हुए उत्तर के स्मरणार्थ लिखे को दोहराने लगते हैं तो समय तेजी से खत्म होने लगते हैं।


आत्मविश्वास की आवश्यकता | परीक्षा के दिन क्या करना चाहिए | परीक्षा के दिन कैसे रहना चाहिए-

परीक्षा के दिनों में आत्म-विश्वास को बनाए रखो। जो कुछ पढ़ा है, समझा है, कंठस्थ किया है, उस पर भरोसा करो। परीक्षा-भवन के लिए चलने से पूर्व मन को शांत रखो। कोई अध्ययन सामग्री साथ न लो, न कहीं से पढ़ने-देखने की चेष्टा करो। परीक्षा-भवन में प्रश्न-पत्र को दो बार पढ़ो। उन प्रश्नों पर चिह्न लगा लो, जिन्हें कर सकते हो। जो प्रश्न सबसे बढ़िया लिख सकते हो, उसे पहले लिखो। लिखने से पूर्व 'कथ्य' सोच लो। कथ्यों का विस्तार करते चलो । उत्तर लिखने के बाद उस उत्तर का पुन: पाठ करो | उत्तर को अंकों के अनुसार छोटा या बड़ा करना न भूलो। यदि कोई प्रश्न अत्यन्त कठिन है, तो उसे अन्त में करो । उस पर कुछ क्षण विचार करो। विचारोपरान्त जो समझ में आता है, उसे लिख दो। इससे परीक्षा के कठिन दिनों की पीड़ा से छुटकारा पा सकोगे।


उपसंहार-

परीक्षा के इन कठिन भयप्रद दिनों को साहसपूर्वक पार करने का अर्थ है सफलता का वरण करना । इसके लिए अनिवार्य है प्रारम्भ से ही एकाग्रचित्त होकर नियमित अध्ययन। प्रमादवश या अध्ययन के प्रति उपेक्षा भाव के कारण नियमित परिश्रम नहीं हो सका तो 'परीक्षा-तैयारी के अवकाश' में धैर्यपूर्वक और नियमित परिश्रम करो । बार-बार पढ़ने से, सहायक पुस्तकों तथा अध्यापकों के सहयोग से कठिनाई दूर हो जाती है। वृन्द कवि ने कहा भी है, 'करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।'


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